परिसीमन को लेकर फिर गरमाई सियासत, दक्षिणी राज्यों को क्यों सता रहा सीटें घटने का डर? समझें पूरा मामला
Dastavej August 9, 2026 0
नई दिल्ली। भारत में परिसीमन एक बार फिर राजनीतिक बहस के केंद्र में है। परिसीमन के जरिए लोकसभा और राज्य विधानसभाओं के निर्वाचन क्षेत्रों की सीमाएं और सीटों का पुनर्विन्यास तय किया जाता है। इस प्रक्रिया का उद्देश्य आबादी और राजनीतिक प्रतिनिधित्व के बीच संतुलन बनाए रखना है।
दक्षिणी राज्यों की मुख्य चिंता यह है कि यदि भविष्य में लोकसभा सीटों का आवंटन मौजूदा आबादी के आधार पर हुआ, तो कम जनसंख्या वृद्धि वाले राज्यों की संसद में कुल हिस्सेदारी घट सकती है। तमिलनाडु, केरल, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश और तेलंगाना जैसे राज्यों ने पिछले दशकों में जनसंख्या वृद्धि और प्रजनन दर को नियंत्रित किया है। दूसरी ओर, उत्तर भारत के कई राज्यों में आबादी अपेक्षाकृत तेज गति से बढ़ी है।
क्या है परिसीमन?
परिसीमन निर्वाचन क्षेत्रों की सीमाएं तय करने और जरूरत के अनुसार उनका पुनर्गठन करने की प्रक्रिया है। इसके दौरान लोकसभा और विधानसभा सीटों के क्षेत्र निर्धारित किए जाते हैं। अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के लिए आरक्षित सीटों का निर्धारण भी इसी प्रक्रिया का हिस्सा है। परिसीमन का काम संसद के कानून के तहत गठित परिसीमन आयोग करता है।
दक्षिणी राज्यों को किस बात की चिंता?
दक्षिणी राज्यों का तर्क है कि उन्होंने शिक्षा, स्वास्थ्य और परिवार नियोजन के क्षेत्र में बेहतर प्रदर्शन करते हुए जनसंख्या वृद्धि को नियंत्रित किया है। यदि प्रतिनिधित्व पूरी तरह वर्तमान आबादी के अनुपात से तय हुआ, तो ज्यादा आबादी वाले राज्यों को अधिक सीटें मिल सकती हैं और दक्षिणी राज्यों की कुल सीट हिस्सेदारी घट सकती है।
केंद्र सरकार का क्या तर्क है?
केंद्र सरकार ने अप्रैल 2026 में परिसीमन से जुड़े प्रस्ताव पर कहा था कि दक्षिणी राज्यों को नुकसान नहीं होगा। केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह के अनुसार, प्रस्तावित मॉडल में लोकसभा की सीटें बढ़ने पर दक्षिणी राज्यों की सीटें भी बढ़ सकती हैं। उनके मुताबिक दक्षिणी राज्यों की सीटें मौजूदा 129 से बढ़कर 195 तक पहुंच सकती हैं और सदन में उनका कुल हिस्सा करीब 24 प्रतिशत के आसपास रह सकता है।
अगली परिसीमन प्रक्रिया कब होगी?
संविधान के प्रावधानों के अनुसार राज्यों के बीच लोकसभा सीटों का आवंटन लंबे समय से 1971 की जनगणना के आधार पर स्थिर है। 2026 के बाद होने वाली पहली जनगणना के आंकड़े भविष्य की परिसीमन प्रक्रिया में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगे।
2026 में केंद्र सरकार ने परिसीमन से जुड़ा विधेयक लोकसभा में पेश किया था। इससे जुड़ा संविधान संशोधन विधेयक आवश्यक विशेष बहुमत हासिल नहीं कर सका। इसके बाद परिसीमन विधेयक भी वापस ले लिया गया। इसलिए अप्रैल 2026 में प्रस्तावित व्यवस्था फिलहाल कानून नहीं बनी है।
दक्षिणी राज्यों में बढ़ी राजनीतिक सक्रियता
परिसीमन के संभावित प्रभाव को लेकर दक्षिणी राज्यों में राजनीतिक गतिविधियां तेज हैं। तमिलनाडु में इस मुद्दे पर सांसदों की बैठक बुलाने की पहल हुई है। आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री एन. चंद्रबाबू नायडू भी पहले जनसंख्या प्रबंधन और राजनीतिक प्रतिनिधित्व को अलग-अलग देखने की बात कह चुके हैं।
क्यों महत्वपूर्ण है यह विवाद?
परिसीमन का सवाल केवल सीटों की संख्या तक सीमित नहीं है। इसका सीधा संबंध लोकसभा में राज्यों के राजनीतिक प्रभाव, संघीय ढांचे और जनसंख्या नीति से है। दक्षिणी राज्यों का सवाल है कि जनसंख्या नियंत्रण में सफलता के बाद उन्हें राजनीतिक प्रतिनिधित्व में नुकसान क्यों उठाना पड़े। वहीं केंद्र का तर्क है कि लोकसभा की कुल सीटों में पर्याप्त वृद्धि से राज्यों की सीटें बढ़ सकती हैं।
आखिर में असली फैसला इस बात से होगा कि भविष्य में परिसीमन के लिए कौन सा फार्मूला अपनाया जाता है, कुल लोकसभा सीटों की संख्या कितनी तय होती है और किस जनगणना के आंकड़ों का इस्तेमाल किया जाता है। यही कारक आने वाले वर्षों में संसद के राजनीतिक संतुलन को तय करेंगे।
