धर्मांतरण के बाद मुस्लिम आरक्षण का लाभ मिलेगा या नहीं? तमिलनाडु सरकार पहुंची सुप्रीम कोर्ट

0
Vijay-12

नई दिल्ली। तमिलनाडु में धर्मांतरण के बाद मुस्लिम आरक्षण का लाभ दिए जाने का मामला अब सुप्रीम कोर्ट पहुंच गया है। मुख्यमंत्री विजय के नेतृत्व वाली राज्य सरकार ने मद्रास हाईकोर्ट के उस फैसले को शीर्ष अदालत में चुनौती दी है, जिसमें इस्लाम अपनाने वाले लोगों को पिछड़ा वर्ग मुस्लिम यानी BCM श्रेणी के तहत आरक्षण देने से इनकार किया गया था।

राज्य सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में विशेष अनुमति याचिका यानी SLP दाखिल कर हाईकोर्ट के फैसले को चुनौती दी है। सरकार का तर्क है कि किसी व्यक्ति के धर्म परिवर्तन करने से उसका सामाजिक, आर्थिक और शैक्षणिक पिछड़ापन समाप्त नहीं हो जाता।

क्या है तमिलनाडु सरकार का तर्क?

तमिलनाडु सरकार का कहना है कि हिंदू धर्म के पिछड़ा वर्ग, अत्यंत पिछड़ा वर्ग, विमुक्त समुदाय या अनुसूचित जाति से संबंधित कोई व्यक्ति यदि इस्लाम धर्म अपना लेता है तो उसकी सामाजिक और शैक्षणिक परिस्थितियां तत्काल नहीं बदलतीं।

राज्य सरकार ने तर्क दिया है कि आरक्षण का उद्देश्य सामाजिक और शैक्षणिक पिछड़ेपन को दूर करना है। ऐसे में धर्म परिवर्तन के आधार पर किसी व्यक्ति को आरक्षण के लाभ से वंचित करना उचित नहीं है।

3.5 प्रतिशत मुस्लिम कोटे से जुड़ा मामला

तमिलनाडु में पिछड़ा वर्ग मुस्लिम समुदाय के लिए 3.5 प्रतिशत आरक्षण की व्यवस्था है।

विवाद इस बात को लेकर है कि हिंदू धर्म के BC, MBC, DNC या SC समुदाय से इस्लाम अपनाने वाले लोगों को इस आरक्षण का लाभ दिया जाना चाहिए या नहीं।

राज्य सरकार ऐसे धर्मांतरित लोगों को पिछड़ा वर्ग मुस्लिम श्रेणी के तहत आरक्षण का लाभ देने के पक्ष में है।

2024 के सरकारी आदेश से शुरू हुआ विवाद

मामले की शुरुआत 9 मार्च 2024 को तत्कालीन राज्य सरकार द्वारा जारी एक शासनादेश से हुई थी।

इस आदेश के तहत धर्म परिवर्तन कर मुस्लिम बने हिंदुओं को मुस्लिम समुदाय की सात अधिसूचित पिछड़ी जातियों में से किसी एक का प्रमाण पत्र देकर आरक्षण का लाभ देने का प्रावधान किया गया था।

इस सरकारी आदेश को मद्रास हाईकोर्ट में चुनौती दी गई थी।

मद्रास हाईकोर्ट ने रद्द कर दिया था आदेश

मद्रास हाईकोर्ट ने राज्य सरकार के 2024 के शासनादेश को असंवैधानिक बताते हुए रद्द कर दिया था।

हाईकोर्ट ने अपने फैसले में कहा था कि हिंदू धर्म छोड़कर इस्लाम अपनाने के बाद कोई व्यक्ति अपनी पुरानी जाति के आधार पर आरक्षण का लाभ जारी नहीं रख सकता।

अदालत के इसी फैसले के खिलाफ अब तमिलनाडु सरकार सुप्रीम कोर्ट पहुंची है।

सुप्रीम कोर्ट में दाखिल की गई कैविएट

तमिलनाडु सरकार की याचिका के बाद मामले के मूल याचिकाकर्ता समीर अहमद, जिला कलेक्टर और तहसीलदार समेत अन्य प्रतिवादियों की ओर से सुप्रीम कोर्ट में कैविएट दाखिल की गई है।

कैविएट दाखिल करने का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि सुप्रीम कोर्ट उनका पक्ष सुने बिना कोई एकतरफा आदेश जारी न करे।

अब सुप्रीम कोर्ट करेगा फैसला

इस मामले में अब सुप्रीम कोर्ट को महत्वपूर्ण संवैधानिक और कानूनी सवालों पर विचार करना होगा।

शीर्ष अदालत के सामने प्रमुख सवाल यह रहेगा कि क्या धर्म परिवर्तन के बाद किसी व्यक्ति का सामाजिक और शैक्षणिक पिछड़ापन आरक्षण के लिए आधार बना रह सकता है और क्या ऐसे लोगों को मुस्लिम समुदाय के लिए निर्धारित पिछड़ा वर्ग आरक्षण का लाभ दिया जा सकता है।

सुप्रीम कोर्ट का फैसला धर्मांतरण, सामाजिक पिछड़ेपन और आरक्षण नीति से जुड़े मामलों के लिए महत्वपूर्ण साबित हो सकता है।

फिलहाल मामले की सुनवाई की अगली प्रक्रिया और सुप्रीम कोर्ट के रुख पर नजर बनी हुई है।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

ये समाचार भी पढ़ें :