ग्रामीणों की ललकार, जंगली जानवरों से सुरक्षा दो सरकार

jan sammelan

रामनगर। उत्तराखंड में जंगली जानवरों का आंतक छाया हुआ है। बाघ, भालू और गुलदार के हमलों में ग्रामीणों की जान जा रही है। दूसरी तरफ बांदर और जंगली सुअर खेती-पाती को चौपट करने में तुले हुए हैं। सरकार का रोल महज मुआवजा की घोषणा तक ही सीमित रह गया है। सरकार लोगो की सुरक्षा के सवाल पर ना तो बात करने को तैयार है ना ही कार्रवाई है। ग्रामीण अपनी जान और उजड़ते खेत-खलियान को लेकर चिंतित हैं।

परेशानहाल ग्रामीणों और विभिन्न जन संगठनों ने सरकार को जगाने का फैसला किया है। इसको लेकर 18 फरवरी को कानिया रामनगर में राज्य स्तरीय जन सम्मेलन का आयोजन किया गया। इस सम्मेलन में क्षेत्रीय जनता व उत्तराखंड के विभिन्न सामाजिक, राजनीतिक व किसान संगठनों के प्रतिनिधियों ने भागीदारी कीे।

संयुक्त संघर्ष समिति की अगुवाई में हुए इस सम्मेलन में मांग की गई है कि जंगली जानवरों से ग्रामीणों, मवेशियों फसलों को सुरक्षा दी जाए। टाइगर, तेंदुआ और जंगली सुंअरों को वन संरक्षण अधिनियम 1973 की सरंक्षित सूची से बाहर रखा जाए। साथ ही जंगली जानवरों के हमले में मृतक आश्रित को 25 लाख रूप्ये एवं घायलों को 10 लाख रूप्ये तक का मुआवजा एवं सम्पूर्ण इलाज की गारंटी दी जाए।
संघर्ष समिति ने चेतावनी देते हुए कहा कि यदि सरकार ग्रामीणों की मांग पर अमल नहीं करती है तो वे राज्य के विधायकों का विधानसभावार घेराव करेंगे।