मजबूत राज्यों से बनेगा सशक्त भारत, उपराष्ट्रपति ने कानूनी सुधारों में बेहतर तालमेल पर दिया जोर
नई दिल्ली। उपराष्ट्रपति सी.पी. राधाकृष्णन ने कहा कि केंद्र और राज्यों के बीच बेहतर समन्वय से देश की शासन व्यवस्था को मजबूत बनाने के साथ आम लोगों तक न्याय और जनकल्याण की योजनाओं का लाभ पहुंचाया जा सकता है। उन्होंने कानूनी सुधारों में राज्यों की जरूरतों और संवैधानिक अधिकारों का ध्यान रखने पर जोर दिया। बुधवार को नई दिल्ली के विज्ञान भवन में भारत के 23वें विधि आयोग की ओर से ‘सहकारी संघवाद और विधिक सुधार: राष्ट्रीय और राज्य परिप्रेक्ष्य’ विषय पर राष्ट्रीय सम्मेलन आयोजित किया गया। इसमें कानून विशेषज्ञों, पूर्व न्यायाधीशों, नीति-निर्माताओं और शिक्षाविदों ने हिस्सा लिया।
विकसित भारत के लिए कानूनी सुधार जरूरी
सम्मेलन का उद्घाटन करते हुए उपराष्ट्रपति ने कहा कि भारत की शक्ति उसकी विविधता में एकता में है। संविधान केंद्र और राज्यों के अधिकारों के बीच संतुलन स्थापित करता है। उन्होंने कहा कि सहकारी संघवाद का उद्देश्य राज्यों की अलग-अलग जरूरतों का सम्मान करते हुए साझा राष्ट्रीय लक्ष्यों को हासिल करना है। ‘विकसित भारत @2047’ का उल्लेख करते हुए उन्होंने प्रभावी कानून, पारदर्शी संस्थानों, कुशल प्रशासन और सुलभ न्याय को देश की प्रगति के लिए जरूरी बताया। साथ ही, पुराने कानूनों की समीक्षा और राष्ट्रीय व राज्य विधि आयोगों के बीच सहयोग बढ़ाने की आवश्यकता जताई।
नागरिकों के हितों को मिले प्राथमिकता
विधि एवं न्याय राज्यमंत्री (स्वतंत्र प्रभार) अर्जुन राम मेघवाल ने कहा कि कानूनी सुधारों में राष्ट्रीय उद्देश्यों के साथ राज्यों के सामाजिक और आर्थिक अनुभवों को भी शामिल किया जाना चाहिए। उन्होंने संस्थागत संवाद, साक्ष्य आधारित सुधार, तकनीक के उचित इस्तेमाल और नागरिक केंद्रित कानून व्यवस्था को महत्वपूर्ण बताया। उन्होंने कहा कि कारोबार, आम जीवन और न्याय प्राप्त करने की प्रक्रिया को आसान बनाना जरूरी है। हालांकि, कानूनों को सरल बनाने के दौरान नागरिकों के अधिकारों और सुरक्षा से समझौता नहीं होना चाहिए।
छह महीने में संयुक्त रिपोर्ट का सुझाव
भारत के विधि आयोग के अध्यक्ष एवं सेवानिवृत्त न्यायमूर्ति दिनेश माहेश्वरी ने राष्ट्रीय और राज्य स्तरीय संस्थानों के बीच सहयोग के लिए साझा कार्ययोजना बनाने का सुझाव दिया। उन्होंने संयुक्त अध्ययन और कानून लागू होने के बाद उसके प्रभाव की समीक्षा पर भी जोर दिया। उन्होंने ‘सिटिजन फ्रिक्शन टेस्ट’ का प्रस्ताव रखते हुए कहा कि कानूनों का आकलन इस आधार पर किया जाना चाहिए कि उनसे नागरिकों का समय, खर्च और प्रक्रियागत परेशानी कितनी कम होती है। उन्होंने संबंधित संस्थानों को करीब छह महीने के भीतर पहला संयुक्त मुद्दा-पत्र तैयार करने का सुझाव भी दिया। विधि आयोग की सदस्य सचिव डॉ. अंजू राठी राणा ने कहा कि कानूनी सुधारों का मुख्य उद्देश्य नागरिकों की जरूरतों को पूरा करना होना चाहिए। उन्होंने राज्यों के बीच निरंतर संवाद और अनुभव साझा करने की आवश्यकता पर बल दिया। सम्मेलन के तकनीकी सत्रों में कानूनों में सुधार के तरीकों, संवैधानिक शक्तियों और सहयोगात्मक न्याय व्यवस्था पर चर्चा हुई। इसमें राज्यों की स्वायत्तता बनाए रखते हुए कानूनी सुधारों को अधिक प्रभावी और जनहितकारी बनाने पर विचार-विमर्श किया गया।
