बैंकिंग सिस्टम में नकदी संकट के संकेत, RBI ने 1.89 लाख करोड़ रुपये झोंके
मुंबई। देश के बैंकिंग सिस्टम में नकदी (लिक्विडिटी) का स्तर करीब तीन महीने के निचले स्तर पर पहुंच गया है। एडवांस टैक्स भुगतान के कारण बैंकों से बड़ी मात्रा में धन सरकारी खातों में चला गया, जिससे बाजार में नकदी का प्रवाह कम हो गया। इस स्थिति को संभालने के लिए भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) को हस्तक्षेप करना पड़ा है।
आरबीआई के आंकड़ों के अनुसार, 17 जून को बैंकिंग प्रणाली में अधिशेष लिक्विडिटी घटकर लगभग 4,772 करोड़ रुपये रह गई, जबकि एक दिन पहले यह 23,881 करोड़ रुपये थी। यह स्तर मार्च 2026 के बाद सबसे कम माना जा रहा है।
क्या है लिक्विडिटी में गिरावट की वजह?
विशेषज्ञों का कहना है कि कंपनियों और कारोबारियों द्वारा एडवांस टैक्स जमा करने के कारण बैंकिंग सिस्टम से बड़ी मात्रा में धन निकल गया। जब टैक्स भुगतान होता है तो यह रकम अस्थायी रूप से सरकारी खातों में चली जाती है, जिससे बैंकों के पास उपलब्ध नकदी कम हो जाती है।
मनी मार्केट दरों पर पड़ा असर
लिक्विडिटी में कमी का असर अल्पकालिक ब्याज दरों पर भी दिखाई देने लगा है। कॉल मनी रेट बढ़कर 5.37 प्रतिशत तक पहुंच गई, जो एक सप्ताह पहले के औसत 5.16 प्रतिशत से अधिक है। इससे बैंकों और वित्तीय संस्थानों के लिए अल्पकालिक उधारी महंगी हो सकती है।
RBI ने किए बड़े कदम
बाजार में नकदी की कमी को दूर करने के लिए रिजर्व बैंक ने पिछले कुछ दिनों में वेरिएबल रेट रेपो (VRR) नीलामियों के जरिए लगभग 1.89 लाख करोड़ रुपये की अस्थायी लिक्विडिटी उपलब्ध कराई है। इनमें 72,300 करोड़ रुपये, 89,440 करोड़ रुपये और 28,220 करोड़ रुपये की अलग-अलग अवधि की नीलामियां शामिल हैं।
इसके अलावा आरबीआई ने 19 जून को 1 लाख करोड़ रुपये की तीन दिवसीय VRR नीलामी आयोजित करने की भी घोषणा की है, ताकि बैंकिंग सिस्टम में पर्याप्त नकदी बनी रहे और ब्याज दरों पर दबाव कम हो।
आगे क्या रहेगा असर?
बाजार विशेषज्ञों का मानना है कि यह नकदी संकट स्थायी नहीं है। जैसे-जैसे सरकारी खर्च बढ़ेगा और टैक्स से जुटाई गई राशि दोबारा अर्थव्यवस्था में आएगी, लिक्विडिटी की स्थिति में सुधार हो सकता है। हालांकि निकट भविष्य में RBI को बाजार पर करीबी नजर रखनी होगी और जरूरत पड़ने पर अतिरिक्त लिक्विडिटी सहायता देनी पड़ सकती है।
वित्तीय क्षेत्र के जानकारों के अनुसार, आरबीआई की त्वरित कार्रवाई से फिलहाल बैंकिंग सिस्टम में किसी बड़े दबाव की आशंका नहीं है, लेकिन बाजार की दिशा काफी हद तक आने वाले दिनों में सरकारी खर्च और नकदी प्रवाह पर निर्भर करेगी।
