बड़ी खबरः यूयूएसडीए के अतिरिक्त कार्यक्रम निदेशक विनय मिश्रा की कार्यप्रणाली पर उठ रहे सवाल!

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देहरादून। उत्तराखंड अर्बन सेक्टर डेवलपमेंट एजेंसी की कार्यप्रणाली इन दोनों सवालों के घेरे में है। राजधानी देहरादून शहर जो हर दिन तेजी से बढ़ रहा है। शहर के लिए बनाए गए करोड़ों रुपए की सीवरेज नेटवर्क में भारी तकनीकी खामियों और लगभग 80 करोड़ से भ्रष्टाचार की रिपोर्ट सामने आई है जिसे न सिर्फ आमजन जनता बल्कि देहरादून आईएसबीटी आने वाले बाहरी राज्यों के लोगों के लिए भी गंभीर समस्याओं की जड़ बना हुआ हैै।

खासकर उत्तराखंड अर्बन सेक्टर डेवलपमेंट एजेंसी की लापरवाही और भ्रष्टाचार ने इस परियोजना को नाकाम और अपूर्ण छोड़ दिया है। वर्तमान में एजेंसी ने 86 किलोमीटर का सीवरेज नेटवर्क बनाया उसमें कई कॉलोनी की लाइनों को मुख्य नेटवर्क से जोड़ा नहीं गया है, जिससे लोगों में भारी आक्रोश है।

स्थानीय लोगों का कहना है कि सिर्फ दिखाने के लिए काम किया जा रहा है जबकि लोगों को इस प्रोजेक्ट से कई परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है। शहर के दर्जनों इलाकों में अधूरी छूटी हुई लाइन लोगों के लिए मुसीबत का सबब बन गई है। जिससे आने वाले बरसात में जल भराव गंदगी और ओवरफ्लो की समस्या और तेजी के साथ बढ़ाने की संभावना है। इतना ही नहीं इस प्रोजेक्ट के कार्य के लिए पाइपलाइन के साइज की भी जालसाजी का मामला सामने आया है।

700 एमएम व्यास की मुख्य आरसीसी सिविल लाइन के भीतर 300 एमएम व्यास की पाइप डाल दिए गए हैं जिससे सीवरेज नेटवर्क बाधित हो रहा है और कई जगह ओवरफ्लो या जाम होने की घटनाएं भी बढ़ रही है। करोड़ों की बर्बादी और भ्रष्टाचार यूयूएसडीए को एशियाई डेवलपमेंट बैंक एडीबी से हजारों करोड रुपए के ऋण प्राप्त हुए हैं। यह राशि विकास कार्यों में खर्च होनी थी लेकिन इस परियोजना में हुई भारी भ्रष्टाचार और लापरवाही ने न केवल करोड़ की बर्बादी की बल्कि आम जनता की जीवन को भी प्रभावित किया है।

वर्तमान में जल संस्थान की रिपोर्ट के अनुसार यूयूएसडीए ने तकनीकी मापदंडों और गुणवत्ता मानकों की अनदेखी है। कालोनियों की सीवरेज लाइन ठीक से ना जोड़ने के साथ-साथ कई अव्यवस्थाएं भी सामने आ रही है। यूएसडीए द्वारा निर्मित सीवरेज नेटवर्क में कई कालोनियों की लाइन अधूरी छोड़ दी गई है जिससे कई कालोनियों का सीवर मुख्य चैम्बर से जुदा नहीं है। यूयूएसडीए ने जल संस्थान को सीवर नेटवर्क का काम पूरा करने के बाद 2018 में जल संस्थान को सौंप़ा था जिसके बाद लगातार इसमें खामियां दिखाई दी है। पाइपों का आकार और प्रकार असंगत है। 700एमएम व्यास की मुख्य आरसीसी लाइन के भीतर 300 एमएम व्यास की पाइप डाल दिए गए हैं जिससे नेटवर्क में जाम और ओवरफ्लो की स्थिति बनी हुई है। इस गड़बड़ी के कारण सीवरेज लाइन अक्सर जाम हो जाती है और ओवरफ्लो के कारण गंदगी चारों ओर फैलती है और सीवर सड़कों पर बह जाता है।

यूयूएसडीए की भूमिका पर उठ रहे गंभीर सवाल उत्तराखंड अर्बन सेक्टर डेवलपमेंट एजेंसी की भूमिका पर अब गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। दरअसल सवाल इसलिए खड़े हुए हैं कि इस योजना के संचालन के लिए जल विद्युत निगम से निदेशक ऑपरेशन के पद पर विनय मिश्रा पिछले लंबे समय से अपर निदेशक तकनीकी के पद पर उक्त एजेंसी में प्रतिनिधि की आधार पर कार्यरत हैं जबकि नियमानुसार प्रतिनयुक्ति 5 साल से अधिक नहीं हो सकती है। उसके बावजूद भी यह अधिकारी अपने पद पर जमा हुआ है जबकि उपरोक्त योजनाओं में कई तरीके की गंभीर अन्यथाएं सामने आ रही है।

प्राप्त सूत्रों की माने तो उक्त अधिकारी वर्तमान में उपाधि शिक्षण तकनीकी के पद पर उक्त योजना का कार्य देख रहे हैं। जबकि इस पद के लिए सिविल इंजीनियर का होना आवश्यक है। लेकिन विनय मिश्रा की योग्यता इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग में है। ऐसे में सवाल खड़े हो गए हैं कि पिछले कई वर्षों से विदाई मिश्रा की प्रतिनियुक्ति कैसे निरंतर हो रही है जबकि योजनाओं में कई खामियां सामने आ रही है।

ऐसे में सवाल उठता है कि क्या इस बड़ी एजेंसी के पास कोई दूसरा योग्य अधिकारी नहीं है या जानबूझकर एक ही अधिकारी को इस पद पर बिठाया जा रहा है ताकि एजेंसी अपने मन मुताबिक काम करवा सके। अगर ऐसा नहीं होता तो प्रतिनियुक्ति पर बुलाए अधिकारी के प्रतिनियुक्ति समाप्त हो जाती है और अपने मूल विभाग में ही कार्य करते लेकिन वह जल विद्युत निगम के कार्यों के साथ-साथ इस योजना का भी संचालन कर रहे हैं जिससे साफ होता है की दाल में कुछ काला है।

गजब की बात तो यह है कि उक्त अधिकारी प्रतिनियुक्ति पर रहते हुए भी अपने विभाग में लगातार प्रमोशन ले रहा है जबकि प्रतिनियुक्ति के दौरान प्रमोशन की प्रक्रिया प्रतीक्षा में रहती है। लेकिन दोहरे लाभ का फायदा इन अधिकारी को मिल रहा है। अब सवाल उठता है की आखिरी इस अधिकारी पर सरकार शासन और विभाग की इतनी मेहरबानी क्यों है? क्यों इस योजना के सही संचालन के लिए सिविल के उच्च पद पर बैठे अधिकारी की नियुक्ति नहीं की जा रही है।

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