हाईकोर्ट ने लगाई फटकार: उत्तराखंड में जंगल की आग बन गई “सालाना उत्सव”
राज्य सरकार की निष्क्रियता पर नाराज़ हुआ हाईकोर्ट, कहा— बार-बार आदेश देने के बावजूद ठोस कदम नहीं
नैनीताल: उत्तराखंड हाईकोर्ट ने राज्य सरकार को जंगल की आग पर काबू न पाने के लिए कड़ी फटकार लगाई है। अदालत ने टिप्पणी की कि राज्य में अब यह आग “हर साल का उत्सव” बन गई है।
मुख्य न्यायाधीश जी. नरेंदर और न्यायमूर्ति सुभाष उपाध्याय की खंडपीठ ने शुक्रवार को कई जनहित याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए कहा कि सरकार ने अदालत के 2017 से जारी निर्देशों के बावजूद कोई ठोस कदम नहीं उठाया। अदालत ने कहा कि सरकार की “लगातार निष्क्रियता” गंभीर चिंता का विषय है।
कोर्ट ने याद दिलाया कि 2016 और 2017 में दिए गए आदेशों में गांव स्तर पर फायर मैनेजमेंट समितियों के गठन, जनजागरूकता अभियानों और दीर्घकालिक वन संरक्षण रणनीतियों के निर्देश दिए गए थे, लेकिन “ज्यादातर आदेश अब तक अधूरे हैं।”
कोर्ट द्वारा नियुक्त अमीकस क्यूरी (amicus curiae) दुष्यंत मैनाली ने सुझाव दिया कि राज्य सरकार पारंपरिक जलाशयों “खाल” के निर्माण पर विचार करे, जिन्हें ऊंचे इलाकों में जोड़कर प्राकृतिक फायर लाइन बनाई जा सकती है। यह जंगल की आग को रोकने का एक टिकाऊ और प्रभावी उपाय साबित हो सकता है।
अदालत ने चेतावनी दी कि अगर सरकार ने अब भी पालन नहीं किया तो यह “बर्दाश्त नहीं किया जाएगा।” अदालत ने सरकार को सोमवार तक एक विस्तृत अनुपालन रिपोर्ट दाखिल करने का निर्देश दिया है, जिसमें अब तक उठाए गए कदमों का ब्यौरा देना होगा।
हाईकोर्ट ने चिंता जताई कि लगातार लगने वाली आग से वन्यजीव आवास नष्ट हो रहे हैं, पर्यावरणीय असंतुलन बढ़ रहा है और हिमालयी क्षेत्र का तापमान भी बढ़ रहा है। न्यायाधीशों ने जंगल की आग को भूस्खलन और बादल फटने जैसी प्राकृतिक आपदाओं में वृद्धि का एक कारण भी बताया।
अदालत ने कहा कि वह उत्तराखंड में सख्त जवाबदेही और पर्यावरण संरक्षण सुनिश्चित करेगी
