राजद्रोह: जनहित के नाम पर ‘षड्यंत्र’ कर रहे स्वयंभू पत्रकारों पर राजद्रोह जरूरीः ढौंडियाल

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देहरादून। पिछले कुछ वर्षो से प्रदेश में कुछ तथाकथित स्वयंभू’ पत्रकारों की वजह से पूरी पत्रकारिता कौम को शक की निगाहों से देखा जाने लगा है। यह तथा कथित स्वयंभू’ पत्रकार अपने निजी फायदे के लिए सरकार तक को ब्लैकमेल करने पर आमदा है। इतना ही नही इन स्टिंगबाजों के खिलाफ रंगदारी से लेकर फिरोती तक के मुकदमें दर्ज है, लेकिन इसके बावजूद भी यह खुद को उत्तराखंड का हिमायती बताने से नही चूकते है। ताजा प्रकरण में एक स्वयंभू’ पत्रकार की गिरफतारी के बाद कुछ चुनिंदा लोगों द्वारा यह महौल बनाया जा रहा है जैसे कोई गांधीवादी या कोई राष्ट्रनायक की गिरफतारी हो गयी हो। ऐसे लोगों को इन स्वयंभू’ किस्म के पत्रकारों के कारनामों को भी जानना अति आवश्क है। जिसका विशलेषण कर रहे है राज्य के वरिष्ठ पत्रकार डॉ. अजय ढौंडियाल।

डॉ. अजय ढौंडियाल की पडताल में यह सब पैसे के खेल के लिये किया जा रहा है..

डॉ. अजय ढौंडियाल कहते है कि ‘स्वयंभू’ ने सवाल उठाया जनहित के मुद्दों को उठाना अपराध है क्या? कतई नहीं। पत्रकारिता इसी को कहते हैं। पत्रकारिता का काम ही जनहित है, हर वो मुद्दा उठाना है जो जनहित का है, जिसका सरोकार जन जन से है, लेकिन अपराध ये है जहां ‘स्वयंभू’ अपने मुद्दे को जबरन जनहित से जोड़ते हैं और उसका इस्तेमाल षड्यंत्र के तहत करते हैं। सरकार और सरकार के चुनिंदा कारिंदे को अपने ‘मुद्दे’ पर घेरकर उसे जनहित का नाम देते हैं। सरकार और सरकार के गलत कामों को गरियाने वाले या उनकी आलोचना करने वालों की उत्तराखंड के पत्रकारिता जगत में कमी नहीं है।

हम फिर कह रहे हैं कि तुझ जैसे की यहां जरूरत नहीं है। अपने एजेंडे को मुद्दा बनाकर उसे जनहित से मत जोड़ों। तुम्हारा ‘मुद्दा’ समझ आता है। कम से कम पत्रकारों को तो समझ आता ही है। ये बात अलग है कि जिसे तुम भोला भाला कहते हो उस पहाड़ी को समझ न आये। लेकिन चिंता मत करो, उस भोले भाले को सच समझाने के लिए हम हैं। आज तुम्हारे ‘मुद्दे’ को वो अपने भले का मुद्दा समझ रहे हैं, लेकिन कल वो भी तुम्हारे ‘मुद्दे’ को समझ जाएंगे। ऐसे ‘मुद्दों’ को उनको समझाने का बीड़ा हमने उठा रखा है। ये जिम्मेदारी हमारी है। हां, तुमने भी एक बीड़ा उठा रखा है। तुम्हारा ‘बीड़ा’ सबकी समझ आज न आए, कल तक आ जाएगा।

चलो फिर सवाल हैं हमारे, जवाब दो। यहां मैंने ‘हमारे’ इसलिए लिखा है क्योंकि कल तक ‘हमारे’ की जगह मैं३’मैं’ ही लिखता था। समझो, आज वो ‘मैं’ शब्द हमारे में तब्दील हुआ ना? सुनो एजेंडाधारी, स्वयं के मुद्दाधारी३अब ‘मैं’ ‘हम’ हो गए हैं। तुम अपने ‘मुद्दे’ को जनहित का नाम देकर ‘कुनबा’ इकट्ठा करने की फिराक में हो। करो। तुम्हारे जाल में एक बार ही फंसेगा वो भोला भाला। वो जिसको तुमने भोले भाले का नाम देकर कमजोर समझा है। याद करो वो प्राइमरी स्कूल की किताब का आखेटक।

चिड़ियाएँ भी समझ गईं थी कि ऐसे आखेटक के जाल से कैसे निकलना है। भोले भाले होटेलियर कहकर जिनको संगठन के नाम पर जोड़ने की बात कर रहे हो वो भी कल तुम्हारे ‘मुद्दे’ की हकीकत जानेंगे। उन्हीं भोले भाले होटेलियरों का मसीहा बनने की कोशिश कर रहे हो? करो। हमारे होटेलियरों का भी अपना दिमाग और उनकी अपनी सोच है। तुम जरूरतमंद होटेलियरों की आड़ में अपना संगठन बनाने की नापाक कोशिश कर रहे हो।

तुम्हारी कोशिश नापाक है। आज नहीं तो कल, तुम जिनको उनका हितैषी बतलाने की कोशिश कर रहे हो वो भी इन नापाक इरादो को समझेंगे। तुम्हारा मुद्दा हमेशा से उत्तराखंड को अस्थिर करना रहा है। तुम्हारी सीधी साजिश रही है उत्तराखंड को अस्थिर करने के पीछे। अरे वो ‘मुद्दाधारी’ तुमको पता है कि उत्तराखंड तभी अस्थिर होगा जब उसे राजनीतिक तौर पर अस्थिर किया जाएगा। पर सुनो। हम भी हैं सामने खड़े।