खबर का असरः यूपीसीएल का 61 करोड़ दबाने वाली कंपनी के खिलाफ एफआईआर की तैयारी!
देहरादून। यूपीसीएल ने 61 करोड़ रुपये दबाने वाली कंपनी पर शिकंजा कस दिया गया है। कंपनी के एनर्जी एक्सचेंज समेत कई राज्यों में भुगतान रुकवा दिए गए हैं। कंपनी से वसूली को एक टीम को दिल्ली सहित अन्य राज्यों के लिये रवाना कर दिया गया है। उत्तराखंड पाॅवर काॅरपोरेश में तत्कालीन प्रबंधन निदेशक स्तर पर बरती लापरवाही से नाराज ऊर्जा सचिव राधिका ने दो बार इस बात के संकेत दे दिये है कि अब वह इस बकाये की वूसली को हरहाल में पूरी करवायेंगी। उधर अधिकारियों निगम के अधिकारी 61 करोड़ की वसूली में हुयी देरी को शासन और तत्कालीन प्रबंध निदेशक की मिलीभगत बता रहे है।

गौरतलब हो कि एक माह पूर्व दस्तावेज न्यूज पोर्ट ने EXCLUSIVE: यूपीसीएल में बिजली खरीद के नाम पर करोडों का घोटाला, चहेती कंपनी ने दबाये 61 करोड शीर्षक से एक समाचार प्रकाशित किया था। जिसके माध्यम से खुलासा किया गया था कि दस्तावेज डाॅट इन को मिले दस्तावेजों से साफ हो गया था कि निगम प्रबंध की मिलीभगत से उर्जा निगम का तकरीबन 61 करोड रूपये सिर्फ इस लिए फंस गये कि कंपनी को चाहने वाले निगम में प्रमुख पद पर बैठे हुये है। उधर दस्तावेज को मिली जानकारी के अनुसार कंपनी बकाया देने के लिए आगे नही आ रही है। जिससे उर्जा निगम में बैठक अधिकारी और शासन में लंबे समय से विभाग को चला रहे अधिकारियों की भी समझ में आ गया है कि उक्त कंपनी से यह पैसा निकालना इतना आसान नही है। जिसे देखते हुये अब निगम उक्त कंपनी के खिलाफ एफआईआर दर्ज इतिश्री करने की तैयारी में है।
जिससे साफ हो गया है कि एक माह पूर्व दस्तावेज ने उत्तराखंड पाॅवर काॅरपोरेशन की नीतियों को लेकर जो सवाल खडे किये थे कि किस प्रकार निगम प्रबंधन ने 61 करोड का चूना काॅरपोरेशन को लगा दिया है। उधर मामले की गंभीरता को देखते हुये उर्जा सचिव ने भी खुद को बचाते हुये साफ कर दिया है कि वसूली में लापरवाही हुई तो जिम्मेदार अधिकारियों पर गंभीर कार्रवाई की जायेगी। उन्होंने जांच टीम को एक सप्ताह में जांच खत्म करते हुए जिम्मेदार लोगों को चिह्नित करने के आदेश दिए। सचिव ने बताया कि आरोपी कंपनी को लेकर एनर्जी एक्सचेंज समेत कई राज्यों को पत्र लिखकर उक्त कंपनी को कोई भुगतान न करने के कहा गया है। केंद्रीय विद्युत प्राधिकरण से कंपनी को डिफॉल्टर घोषित करने को कहा गया है।
दोबारा दो साल का करार करने वाले भी निशाने पर
गौरतलब है कि कोरोनाकाल में राज्य में उपयोग के बाद बची बिजली को एक प्राइवेट कंपनी के माध्यम से बाजार में बेचा गया। उक्त कंपनी ने बिक्री का पैसा तय समय में यूपीसीएल को नहीं दिया। इस मामले में उच्चस्तर पर भी अफसरों की लापरवाही सामने आ रही है। सवाल उठ रहे हैं कि जब कंपनी पर करोड़ों का बकाया था, तो मार्च 2020 में कंपनी के साथ दोबारा करार आगे कैसे बढ़ाया गया? आमतौर पर करार एक साल का होता है, इस बार उसे दो साल के लिए किया गया। कंपनी के साथ करार पर किन अफसरों ने साइन किए, उनकी भूमिका की भी जांच होगी। इतने वर्षों तक यूपीसीएल का ऑडिट विभाग भी आंखे मूंदे रहा। कंपनी के साथ जब तीन दिन में भुगतान करने का करार है, तो वह एक महीने में बिलिंग कैसे करता रहा।
