प्रतिनियुक्ति पर आये कुलसचिव को लगा कुर्सी का चस्का, सिफारिश के लिए कर रहा संघ और नेताओं की परिक्रमा
देहरादूनः प्रदेश के एक विश्विद्यालय के कुलसचिव को साल भर में ही कुर्सी से इतना मोह हो गया कि वह प्रतिनियुक्ति अवधि समाप्त होने के बाद भी वापस अपने मूल विभाग नहीं जाना चाहता। कुलसचिव की कुर्सी पर बरकरार रहने के लिये महाशय संघ के पदाधिकारियों और सत्तासीन नेताओं की चौखटों पर दस्तक दे रहा है। आखिर सवाल उठाता है कि कुलसचिव को एक साल में ऐसी कौनसी तिजोरी हाथ लग गई जिससे कुर्सी के प्रति उन्हें इतना मोह हो गया। अगर प्रतिनियुक्ति पर आये कुलसचिव के एक साल के कार्यकाल को देखें तो साफ जाहिर होता है कि उन्होंने विश्वविद्यालय की साख पर हमेशा कुठाराघात किया। कभी कुलपति के खिलाफ विभिन्न संगठनों को खड़ा कर पुतले जलवाये, कभी छात्रों को कुलपति के खिलाफ भडकाया, तो कभी अखबारबाजी की।
इतना ही नहीं विश्विवद्यालय में अविश्वास का माहौल पैदा कर कर्मचारियों को भड़काया और उन पर अपना रौब गालिब किया। ऐसे में जो कर्मचारी विश्वविद्यालय के लिए 10 से 11 घण्टे कार्य करते थे, वह अब अपना दिन काटने में भलाई समझते हैं। जिसका खामियाजा सीधे छात्रों को भुगतना पड रहा है। गजब देखिए सालभर तक राजनीति करने वाला कुलसचिव अब कुर्सी के लिए मंत्री और नेताओं की चमचागिरी पर उतर आया है। ऐसे में सवाल यह भी उठता है कि जो कुलसचिव पूरे एक साल विश्वविद्यालय के लिए कुछ नहीं कर पाया वह अब वक्त लेकर क्या गुल खिलाना चाहता है।

कुलसचिव पद की योग्यता पूरी न करने के बावजूद डर्टी पालिटिक्स की पगडंडियों के सहारे वह प्रतिनियुक्ति पर कुलसचिव तो बन गये। लेकिन अपनी आयोग्यताओं के चलते बाबू मोशाय ने एक वर्ष के भीतर विश्वविद्यालय की प्रतिष्ठा को धूमिल कर डाला। इतना ही नहीं कुलसचिव राजनीति के बूचड़खानों में अपनी शोखी पीटते हुए कहते फिरते हैं कि उन्होंने एक साल में वह काम कर दिखाया जो कुलपति पिछले सात साल में नहीं कर पाये। दरअसल सात साल की उपलब्धियों पर कुलसचिव की अयोग्यता का ग्रहण लग गया जिससे विश्वविद्यालय की उपलब्धियां ठहर सी गई है।
प्रतिनियुक्ति पर आये कुलसचिव का एक वर्ष का कार्यकाल देखें तो स्थिति स्पष्ट हो जाती है कि आयोग्यता का कोहरा कितना घना है। विश्वविद्यालय में कुलसचिव पद पर नियुक्ति होने से एक माह पहले ही कुलसचिव के नाम का उल्लेख हो चुका था। राजनीति के आकाओं की चाह पर विवादित छवि वाले व्यक्ति को नियम-कानून को ताक पर रख नियुक्ति दी गई, जबकि कुलसचिव पद के लिए आवेदित अन्य उम्मीदवार कहीं ज्यादा योग्य और अनुभवी थे। कुलसचिव की विवादित नियुक्ति उन दिनों समाचार पत्रों में प्रमुखता से प्रकाशित हुई थी। लेकिन मामला ढाक के तीन पात रहा।
नियुक्ति पाते ही कुलसचिव उस वक्त विवादों में घिर गये जब उन्होंने विश्वविद्यालय से सम्बद्व कालेजो की बैठक बुलाई और काॅलेज प्रबंधकों को अपना निजी ई-मेल और मोबाइल नम्बर दिये और उन्हें उक्त नंबरों पर सीधे बात करने को कहा गया। जिस पर कालेजांे के प्रबंधकों द्वारा आपत्ति दर्ज की गयी और इसकी शिकायत प्रदेश के राज्यपाल और विश्वविद्यालय के कुलपति से की गई। अयोग्य कुलसचिव की कार्यप्रणाली की यह पहली बानगी थी उन्हें पता होना चाहिए था कि राजकीय नम्बर तो सब देते हैं पर निजी नम्बर देने का क्या औचित्य है।
विश्वविद्यालय द्वारा संबद्ध कालेजों द्वारा राज्यपाल महोदया को पत्र प्रेषित कर नाराजगी दर्ज की गई कि कुलसचिव ने अपने फेसबुक, व्हट्सअप अकाउंट पर विभिन्न राजनीति दलों की फोटो चस्पा की है। जो कि नियमानुसार गलत है। इस मसले पर विश्वविद्यालय के कुलपति द्वारा उनसे से स्पष्टीकरण मांगा गया।
परीक्षा के दौरान कालेजो का निरीक्षण करते समय एक कालेज प्रबन्धक द्वारा कुलसचिव पर शिक्षिकाओं से छेड़छाड़ और रिश्वत लेने का आरोप लगाया गया। कालेज द्वारा इसकी रिर्पोट पुलिस को भी लिखाई गयी, लेकिन राजनीतिक रसूख के चलते मामला दबा दिया गया।
कुलसचिव की नियुक्त से पहले भी विभिन्न कालेजो में परीक्षायें सम्पन्न होती थी, लेकिन प्रतिनियुक्ति पर आये कुलसचिव को ऐसा क्या आभास हुआ कि उन्हें कालेजों में नकल होने का भय सताने लगा। कुलसचिव ने इसके आड़ में अपने चहतों के यहां परीक्षा उत्तरपुस्तिका, पेपर हेतु संकलन केन्द्र बना डाले। कालेजो द्वारा इसका विरोध किया गया लेकिन कोई कार्यवाही नही हुई।
इतना ही नहीं विवादित छवि वाले कुलसचिव ने अपने ही कुलपति का पूतला फूंकवाया। कुलपति द्वारा जब कुलसचिव को रिपोर्ट दर्ज करने को कहा गया तो कुलसचिव विश्वविद्यालय मुख्यालय से गायब हो गये। कुलसचिव की कारगुजारियों के चलते विश्वविद्यालय और शासन में फाइलों का वजन तो बढ़ता चला गया लेकिन किसी ने इस बात का संज्ञान नही लिया कि कुलसचिव के खिलाफ कार्यवाही की जाय। कुलाधिपति द्वारा समय समय पर शासन से जबाब तलब किया गया लेकिन शासन के अधिकारियों पर डर्टी पाॅलिटिक्स हावी रही।
विवादित कुलसचिव अब एक बार फिर विश्वविद्यालय में कुलसचिव की कुर्सी पर जोंक की तरह चिपके रहने की फिराक में है। लिहाजा कुलसचिव ने अपने आकाओं की चाटुकारिता और उनकी परिक्रमा करनी शुरू कर दी है। लेकिन सवाल भविष्य के लाखों कर्णधारों का है। क्या इस बार भी एक अयोग्य कुलसचिव को विश्वविद्यालय पर थोपा जायेगा या फिर डबल इंजन की यह सरकार वास्तव में किसी योग्य व्यक्ति को कुलसचिव पद पर तैनात कर भविष्य की पौध के लिए फिक्रमंद होगी।
