स्क्रूटनी कमेटी ने कहा – शंभू पासवान के जाति प्रमाण पत्र में त्रुटि नहीं
शंभू के पास हैं- दो निवास प्रमाण पत्र और तीन जाति प्रमाण पत्र
महिपाल नेगी
उच्च न्यायालय नैनीताल, रिट याचिका सं 662 / 2025 दिनेशचंद्र बनाम उत्तराखंड सरकार में जारी निर्देश पर जिलाधिकारी देहरादून द्वारा गठित स्क्रूटनी कमेटी ने बहुचर्चित मामले में शंभू पासवान के अनुसूचित जाति प्रमाण पत्र में कोई त्रुटि नहीं पाई।
जांच रिपोर्ट से पता चलता है कि शंभू पासवान के पास कुल तीन जाति प्रमाण पत्र, एक निवास और एक स्थाई निवास प्रमाण पत्र हैं। निवास प्रमाण पत्र 6 मार्च 1998 को उप जिलाधिकारी ऋषिकेश द्वारा जारी किया गया है। यह ऋषिकेश में 1978 से निवास के आधार पर बनाया गया है। दिलचस्प बात यह है कि शंभू पासवान ने स्वयं अपने मेयर के नामांकन पत्र में कहा था कि उन्होंने 1983 में बिहार से आठवीं पास किया। तो सीधा सवाल है कि 1978 से उत्तराखंड में निवास का प्रमाण क्या है.? इसका रिपोर्ट में कोई उल्लेख नहीं। 1978 में शंभू 11 साल का था और कक्षा तीन में पढ़ता होगा, क्या वह किसी कुंभ में खोकर ऋषिकेश पहुंचा होगा और फिर 1983 में वापस बिहार जाकर आठवीं पास किया.?
शंभू को स्थाई निवास तो 30 मार्च 2008 को परगना अधिकारी ऋषिकेश द्वारा जारी किया गया। तीन-तीन जाति प्रमाण पत्र जारी हुए। पहला 17 जुलाई सन 2000 आवासीय मजिस्ट्रेट ऋषिकेश, दूसरा 29 मार्च 2012 को तहसीलदार ऋषिकेश और तीसरा जाति प्रमाण पत्र जो मेयर नामांकन के साथ लगाया गया, 11 दिसंबर 2013 का तहसीलदार ऋषिकेश द्वारा जारी।
तीन-तीन जाति प्रमाण पत्र से सवाल उठता है कि स्वयं शंभू पासवान को अपने पहले और फिर दूसरे जाति प्रमाण पत्र पर भरोसा नहीं था ? एससी के जाति प्रमाण पत्र रेन्यूवल नहीं होते हैं। दिनेश चंद्र मास्टरजी द्वारा उठाए गए सवालों का कमेटी ने कोई खास संज्ञान नहीं लिया। दो लाइन में लिख दिया कि उन्होंने जो दस्तावेज प्रस्तुत किए हैं उनसे यह प्रतीत नहीं होता कि शंभू पासवान को तहसील ऋषिकेश से जारी अनुसूचित जाति के प्रमाण पत्र में शासनादेशों में वर्णित व्यवस्था का पालन न किया गया हो।
दिनेशचंद्र मास्टर जी ने भारत सरकार के कल्याण व गृह मंत्रालयों के विभिन्न शासनादेश व परिपत्रों के साथ ही उच्च व सर्वाेच्च न्यायालय के कुछ आदेश भी प्रस्तुत किये। और उन सब में यह बात स्पष्ट रूप से कही गई है कि किसी राज्य में जाति प्रमाण पत्र का लाभ तभी मिलेगा जब वह मूल रूप से उस राज्य का निवासी हो। अपर सचिव भारत सरकार कल्याण मंत्रालय 16 अगस्त 1990 का आदेश, निदेशक भारत सरकार कल्याण मंत्रालय का 20 नवंबर 1990 का पत्र, संयुक्त सचिव भारत सरकार गृह मंत्रालय का 22 फरवरी 1985 का पत्र, संयुक्त सचिव भारत सरकार गृह मंत्रालय 18 नवंबर 1982 व 6 अगस्त 1984 का पत्र, अपर सचिव भारत सरकार गृह मंत्रालय 29 जून 1982 का पत्र, अपर सचिव भारत सरकार गृह मंत्रालय 18 नवंबर 1982 का पत्र के साथ ही न्यायालयों के आदेश – एक्शन कमेटी बनाम भारत सरकार फैसला 18 जुलाई 1994, चंद्रशेखर राव 1990 का मामला, श्वेता संतलाल बनाम महाराष्ट सरकार 2010 का मामला, रंजना कुमारी बनाम उत्तराखंड सरकार नवंबर 2018 के मामले के आदेश भी प्रस्तुत किए गए।
कमेटी के विश्लेषण में कहा गया है कि उत्तर प्रदेश पुनर्गठन विधेयक 2000 की अनुसूचि पांच के अनुसार शंभू पासवान को अनुसूचित जाति का प्रमाण पत्र निर्गत किया गया है। शासनादेश संख्या 1118 दिनांक 2 अप्रैल 2013 की सूची के क्रमांक 33 पर दुसाध जाति अंकित है। यह भी कहा गया कि 9 नवंबर 2000 या उससे पूर्व उत्तराखंड राज्य के स्थाई निवासी को एससी, एसटी ओबीसी के प्रमाण पत्र निर्गत किए जाते हैं। स्पष्ट है कि कमेटी ने निवास, स्थाई निवास और मूल निवास में फर्क नहीं किया। शंभू पासवान वर्ष 2000 से पहले का उत्तराखंड का मूल निवासी तो छोड़िए स्थाई निवासी भी साबित नहीं कर पाया।
शंभू पासवान के नाम अगस्त 2001 में ऋषिकेश में कोई भूमि खतौनी में दर्ज हुई है। अर्थात उत्तराखंड राज्य बनने से पूर्व शंभू पासवान के नाम कोई पैतृक संपत्ति तो छोड़िए अपने नाम भी कोई संपत्ति दर्ज नहीं थी। कमेटी ने उन कानूनी व्यवस्थाओं में भी फर्क नहीं किया कि निवास, स्थाई निवास और मूल निवास प्रमाण पत्र बनाना अलग बात है और जाति प्रमाण पत्र का लाभ पाना अलग बात।
रंजना कुमारी बनाम उत्तराखंड सरकार के मामले में नवंबर 2018 के नैनीताल हाई कोर्ट का फैसला भी प्रस्तुत किया गया, जिसमें पंजाब के मूल निवासी वाल्मीकि जाति का एक प्रमाण पत्र उत्तराखंड में प्रभावी नहीं माना गया। नौकरी या चुनाव लड़ने के लिए आरक्षित जाति के लाभ की व्यवस्थाएं अलग-अलग नहीं हैं। यदि प्रमाण पत्र नौकरियों के लिए लागू नहीं होना है तो चुनाव के लिए भी लागू नहीं होगा।
इसे ऐसा भी समझ सकते हैं कि क्या उत्तराखंड की किसी अनुसूचित जाति का व्यक्ति दिल्ली, पंजाब उत्तर प्रदेश आदि में 15 – 20 साल निवास करने के आधार पर यदि वह जाति वहां भी शेड्यूल हो तो क्या जाति प्रमाण पत्र बन जाएगा और वहां आरक्षित सीट पर चुनाव लड़ सकता है.? या क्या आरक्षित कोटे में नौकरी का लाभ ले सकता है.? नहीं ना .? तो या तो पूरे देश में एक जैसी व्यवस्था हो। क्या अब तक किसी का प्रमाण पत्र बना है? क्या कोई मेयर, महापौर छोड़िए, पार्षद भी बना है.? किसी को नौकरी मिली है.?
लेकिन, लेकिन, लेकिन … मामला अभी यहीं खत्म नहीं होता। रिपोर्ट उच्च न्यायालय नैनीताल में जाएगी। जहां दिनेशचंद्र मास्टरजी, बल्कि कहिए उत्तराखंड के पक्ष में, दर्जन भर वकील पैरवी के लिए तैयार हैं। यह कोई पहाड़ या मैदान का मामला भी नहीं है, बल्कि पूरे उत्तराखंड राज्य के अनुसूचित जाति, जनजाति और पिछड़ा वर्ग के लोगों से जुड़ा मामला है .. . .
और मामला अभी खत्म नहीं हुआ है ……..
स्क्रूटनी कमिटी में देहरादून के अपर जिलाधिकारी प्रशासन, उप जिलाधिकारी ऋषिकेश, जिला प्रोबेशन अधिकारी, जिला समाज कल्याण अधिकारी, जिला कार्यक्रम अधिकारी शामिल किये गए थे।
