एक्सक्लूसिव ख़बरः कुलपति नियुक्ति विवाद में सर्च कमेटी पर उठे सवाल, मनमाफिक किया दावेदारों का चयन
देहरादूनः श्रीदेव सुमन उत्तराखंड विश्वविद्यालय को भले ही अभी नया कुलपति नहीं मिला हो लेकिन कुलपति की नियुक्ति से पहले विवाद गहराने लगा है। सर्च कमेटी ने जिन तीन नामों का पैनल राजभवन को भेजा है। उन तीनों का काॅरियर रिकाॅर्ड बेहत्तर नहीं बताया जा रहा है। तीनों ही अभ्यर्थी किसी न किसी विवाद में फंसे हैं। हालांकि तीनों अभ्यर्थियों की विवादित पृष्ठभूमि होने कारण इसकी राजभवन से बकायदा लिखित में शिकायत की जा चुकी है।

इतना ही नहीं इस प्रकरण में अब एक और गंभीर मामला सामने आ रहा है। जो सीधे-सीधे सर्च कमेटी को कटघरे में खडे़ कर रहा है। कि आखिर पैनल में नामित व्यक्तियों में कमेटी द्वारा क्या देखा गया जो उनके नाम राजभवन में प्रेषित किये गये। जबकि कमेटी के सदस्य बखूबी जानते थे इन नामों पर आपत्ति जताई जायेगी। ऐसे में सवाल उठाता है कि तीनों व्यक्तियों के नाम पैनल में शामिल करने के लिए क्या बाहरी तत्वों द्वारा दबाव डाला गया। अगर ऐसा है तो फिर यह प्रदेश के हितों के साथ धोखा है।
सर्च कमेटी के फैसले पर सवाल

कुलपति नियुक्ति को लेकर चर्चाओं का बाजार गर्म है। विश्वविद्यालय का नया कुलपति कौन होगा यह तय करना भले ही राजभवन का संवैधानिक अधिकार है। लेकिन कुलपति के चयन के लिए शासन स्तर पर गठित सर्च कमेटी कटघरे में है। सर्च कमेटी द्वारा जिस प्रकार से पैनल में नाम शामिल किये गये हैं उससे लगता है कि सर्च कमेटी द्वारा फैसला किसी के दबाव में लिया है। अन्यथा सर्च कमेटी इस बार कुलपति चयन में ‘पिक एंड चूज’ का फाॅर्मूला नहीं अपनाती। ऐसे में सर्च कमेटी के फैसले पर सवाल उठने वाजिब है। पूर्व में देखें तो कुलपति चयन के लिए शासन द्वारा गठित सर्च कमेटियों ने बकायदा अभ्यर्थियों के साथ इंटरेक्शन किया और ठोस संवाद के बाद राजभवन को नामों का पैनल भेजा। लेकिन इस बार सर्च कमेटी ने लीक से हटकर काम किया। जो कि एक स्वस्थ परंपरा को खत्म करना जैसा है।
शैक्षिक योग्यता पर सवाल
सर्च कमेटी द्वारा जिन तीन नामों का पैनल राजभवन को सौंपा गया है। उस पैनल में शामिल व्यक्तियों की शैक्षिक योग्यता पर भी सवाल उठ रहे हैं। सूत्रों की माने तो जिन तीन लोगों का नाम पैनल में शामिल है उनकी शैक्षिक पृष्ठभूमि निम्न स्तरीय है जो कि कुलपति जैसे पद के लिए आदर्श नहीं है। जबकि कुलपति पद के लिए अच्छा एकेडमिक रिकाॅर्ड होना अतिआवश्यक है। जिसमें कम से कम 55 फीसदी अंकों के साथ परास्नातक और स्नातक होना जरूरी है। इसके साथ ही रिसर्च वर्क होना भी बेहद जरूरी है। शोध क्षेत्र में उत्तम रिकाॅर्ड वाले व्यक्ति को कुलपति पद के लिए ज्यादा प्रथमिकता प्रदान की जाती है। लेकिन सर्च कमेटी द्वारा जिन तीन नामों को राजभवन भेजा है, उनमें किसी भी व्यक्ति के पास उत्तम शैक्षिक रिकाॅर्ड नहीं है। जबकि अन्य आवेदकों के पास पैनल में शामिल अभ्यर्थियों के मुकाबले बेहत्तर एकेडमिक रिकाॅर्ड था। लेकिन सर्च कमेटी ने इसे पूरी तरह से नजरअंदाज कर चहेतों को फायदा पहुंचाया। वहीं सूत्रों का यह भी कहना है कि सर्च कमेटी ने जिन नामों का पैनल भेजा है उसमें तृतीय श्रेणी में उत्तीर्ण एक अभ्यर्थी शामिल है। इससे साफ होता है कि सर्च कमेटी ने कहीं न कहीं उन आवेदकों के साथ नइंसाफी की है जिनका एकेडमिक रिकाॅर्ड बेहत्तर था।
नकल में पकड़ा व्यक्ति कुलपति का दावेदार
राज्य सरकार की नीति रही है कि वह प्रदेश को एजुकेशन हब के रूप में डेवलप करे। इसी का नतीजा है कि केंद्र के साथ-साथ राज्य सरकार हर मंच पर प्रदेश को ‘विद्या धाम’ के तौर पर पेश करते रहे हैं। लेकिन सवाल उठाता है क्या प्रदेश को ऐसे ही विद्या धाम बनाया जायेगा। जहां एक विश्वविद्यालय के कुलपति पद के लिए सर्च कमेटी द्वारा ऐसे उम्मीदवारों का चयन किया जाता है जिनका नाता विवादों से रहा हो। इतना ही नहीं सर्च कमेटी जो नाम सुझाये हैं उन पर नकल में पकड़े जाने का गंभीर आरोप है। ऐसे में सवाल उठाता है कि क्या विश्वविद्यालय को ऐसा कुलपति मिलेगा जो खुद ही नकल में पकड़ा गया हो। जबकि नकल करना और करवाना कानूनन अपराध है। लिहाजा राजभवन को इस तथ्य पर भी गौर फरमाना होगा और यह सुनिश्चित करना होगा कि विश्वविद्यालय को अच्छे एकेडमिक रिकाॅर्ड के साथ-साथ शोधात्मक व्यक्तित्व वाला कुलपति मिले। जिससे सरकार की प्रदेश को ‘विद्या धाम’ बनाने की मंशा को पूरी हो सके।
