पिछले 11 सालों में केंद्र सरकार ने पब्लिक सेक्टर बैंकों में लगायें 2.6 लाख करोड़

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हर बार देश के वित्त मंत्रियों के लिए दो चुनौतियां होती हैं- खर्च की जरूरत को पूरी करना, जिससे सोशल सेक्टर की योजनाओं को सुधारा जा सके। साथ ही राजकोषीय घाटे को कम करना क्योंकि टैक्स कलेक्शन काफी नहीं होता। हाल के वर्षों में वित्त मंत्रालय के सामने एक नई चुनौती उभर के आ गई है, वह है पब्लिक सेक्टर बैंकों को संभालने की। कॉर्पोरेट फ्रॉड और बैड लोन के कारण बैंकों के बढ़ रहे एनपीए को काबू करने के लिए सरकार पीएसयू बैंकों में पैसे लगाती आ रही है।

पिछले 11 सालों में देश के तीन वित्त मंत्री प्रणव मुखर्जी, पी चिदंबरम और अरुण जेटली पब्लिक सेक्टर बैंकों को एनपीए से उबारने के लिए 2.6 लाख करोड़ रुपये लगा चुके हैं। यह आंकड़ा 2जी के अनुमानित घाटे से भी ज्यादा है। यह सरकार द्वारा इस साल ग्रामीण विकास के लिए आवंटित की गई राशि के दोगुने से ज्यादा है।

बैंकों के रीकैपिटलाइजेशन के लिए इस वित्त वर्ष और अगले वित्त वर्ष निकाले गए 1.45 लाख करोड़ रुपये के अलावा सरकार 2010-11 से 2016-17 के बीच बैंकों को 1.15 लाख करोड़ दे चुकी है। एसबीआई समेत अन्य पब्लिक सेक्टर बैंक एनपीए के कारण पिछले दो वित्त वर्षों से घाटे में हैं। इस वित्त वर्ष भी बैंकों के अच्छे दिन नहीं आने वाले। देश के सबसे बड़े बैंक एसबीआई ने पिछले 18 सालों में पहली बार तिमाही घाटा दर्ज किया है। बैंक ऑफ बड़ौदा का हाल भी ऐसा ही है। रेटिंग एजेंसी केयर के मुताबिक, ‘एनपीए की बात करें तो ऐसा नहीं लगता कि पब्लिक सेक्टर बैंकों का बुरा दौर समाप्त हो गया है।’

सरकारी बैंकों का मानना है कि नौकरशाही के बेवजह अड़ंगा के कारण उनको दिक्कत पेश आ रही है। इसके अलावा मुद्रा समेत कई सरकारी योजनाओं के लिए सरकारी बैंकों को कर्ज भी देना पड़ रहा है और इससे भी स्थिति बिगड़ी है।

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