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भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस एक बार फिर अपने अंदरूनी मतभेदों को लेकर चर्चा में है। लंबे समय से सत्ता से बाहर चल रही पार्टी अब उत्तराखंड में 2027 चुनावों की तैयारी कर रही है, लेकिन उससे पहले ही नेताओं के बीच वर्चस्व की लड़ाई खुलकर सामने आने लगी है।

प्रदेश में लगातार चुनावी हार के बाद संगठन को मजबूत करने की कोशिशें जारी हैं, लेकिन अंदरूनी खींचतान इन प्रयासों पर भारी पड़ती दिख रही है। हाल ही में कुछ नेताओं के पार्टी में शामिल होने से कांग्रेस को बढ़त मिलती नजर आ रही थी, लेकिन इसी बीच पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत के अचानक 15 दिनों के अवकाश पर जाने से राजनीतिक हलचल तेज हो गई।

बताया जा रहा है कि रामनगर के नेता संजय नेगी को पार्टी में शामिल न किए जाने से नाराजगी बढ़ी है। इस मुद्दे पर पार्टी के भीतर खुलकर बयानबाजी शुरू हो गई है। धारचूला से विधायक हरीश धामी ने हरीश रावत के समर्थन में तीखी प्रतिक्रिया देते हुए यहां तक कह दिया कि जरूरत पड़ी तो वे विधायक पद छोड़ने को भी तैयार हैं, लेकिन उनका साथ नहीं छोड़ेंगे।

इस विवाद में पूर्व मंत्री हरक सिंह रावत पर भी निशाना साधा गया। 2016 के घटनाक्रम का जिक्र करते हुए पार्टी नेताओं ने पुराने बागी रुख को याद दिलाया और मौजूदा हालात पर सवाल उठाए।

प्रदेश अध्यक्ष गणेश गोदियाल भले ही संगठन को एकजुट रखने की कोशिश कर रहे हों, लेकिन जमीनी स्तर पर असंतोष बढ़ता दिख रहा है। वहीं रंजीत रावत और हरीश रावत के बीच पुरानी खींचतान भी इस विवाद को और हवा दे रही है।

राजनीतिक जानकार मानते हैं कि यदि समय रहते यह अंतर्कलह नहीं सुलझा, तो इसका असर न सिर्फ रामनगर बल्कि अन्य सीटों पर भी पड़ सकता है। दूसरी ओर, विपक्षी दल इस स्थिति का लाभ उठाने की कोशिश में हैं और असंतुष्ट नेताओं को अपने पाले में लाने की रणनीति बना रहे हैं।

कुल मिलाकर, चुनाव से पहले कांग्रेस के सामने सबसे बड़ी चुनौती विपक्ष नहीं, बल्कि अपने ही घर को संभालने की बनती जा रही है।

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