देवभूमि के मौन पहाड़ों की पुकार

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कमल के. पांडेय
स्वतंत्र टिप्पणीकार, तकनीकी एवं मीडिया नवाचारों के विश्लेषक
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उत्तराखंड बने पच्चीस साल होने को आए, लेकिन पहाड़ का दर्द जस का तस है बल्कि और गहरा हो गया है। कभी यह प्रदेश इसलिए मांगा गया था कि पहाड़ की आवाज़ दिल्ली तक पहुंचे, लेकिन अब हाल यह है कि पहाड़ से आवाज़ ही गायब होती जा रही है और इसके साथ ही उसकी राजनीतिक हैसियत भी।

खेत बंजर हैं, घरों में ताले हैं, स्कूलों में शिक्षक नहीं, अस्पतालों में डॉक्टर नहीं, और सड़कों पर केवल सरकारी वाहनों की चहल-पहल है। पलायन अब सामाजिक त्रासदी नहीं, बल्कि राज्य की स्थायी पहचान बन गया है। हर सरकार ने रोजगार, शिक्षा और स्वास्थ्य की बातें कीं। आयोग बने, विभाग बने, लेकिन परिणाम फाइलों में ही दफन रह गए। सरकारी योजनाओं की धूल में विकास के सपने खो गए।

लेकिन असली प्रश्न यह है कि दोष किसका है? सरकारों पर ठीकरा फोड़ना आसान है, पर सच यह है कि सरकारें वही होती हैं जिन्हें हम चुनते हैं। हमने जाति, धर्म और रिश्तों की राजनीति को अपने विवेक से ऊपर रख दिया। यह लोकतंत्र नहीं, सामूहिक आत्मप्रवंचना है। राजनीति का स्तर हमने ही गिराया है। अगर जनता योग्य प्रत्याशी को प्राथमिकता देती, तो दल भी योग्य उम्मीदवार उतारते। मगर हमें काम नहीं चाहिए, हमें केवल ‘अपना आदमी’ चाहिए और यही अपनापन हमें हर बार धोखा देता रहा है।

जिस उत्तराखंड के लिए हमने संघर्ष किया था, वह अब आंकड़ों और घोषणाओं के जंगल में खो गया है। पहाड़ी क्षेत्रों की विधानसभा सीटें पहले 40 थीं, अब 34 रह गईं और अगले परिसीमन में शायद 28 पर सिमट जाएं। यह केवल संख्या का खेल नहीं, बल्कि पहाड़ की राजनीतिक आवाज़ के क्षीण होने की कहानी है। यह हमारी चुप्पी का परिणाम है, जिसने हक़ की लड़ाई को “पलायन” में बदल दिया और नेताओं को “मालिक” बना दिया।

जब तक हम जाति और क्षेत्र की सीमाओं से ऊपर उठकर योग्यता और ईमानदारी को वोट नहीं देंगे, तब तक पहाड़ के हिस्से में खाली घर, बंद स्कूल और टूटी सड़कें ही आएंगी।

पलायन केवल लोगों के चले जाने की बात नहीं, बल्कि उस समाज की जड़ों के कमजोर पड़ने का प्रतीक है। आज पहाड़ के प्राथमिक विद्यालय भवन तो हैं, पर बच्चों की आवाज़ें नहीं। जब सरकारी प्राथमिक विद्यालयों में बच्चे नहीं होंगे, तो सरकारी इंटर कॉलेजों में छात्र कहाँ से आएंगे? और जब माध्यमिक शिक्षा कमजोर होगी, तो उच्च शिक्षा की परंपरा अपने आप ढह जाएगी। शिक्षा का यह ढांचा तभी टिक सकता है, जब स्थानीय समाज उसमें फिर से जीवन फूंके।

स्वास्थ्य सेवाओं की स्थिति भी बदतर है। जहाँ अस्पताल हैं वहाँ डॉक्टर नहीं, और जहाँ डॉक्टर हैं वहाँ उपकरण व दवाएँ नहीं। प्रसूति से लेकर आपात स्थिति तक, हर बीमारी में पहाड़ का आदमी मैदानों की ओर भागता है। यह केवल प्रशासनिक कमी नहीं, बल्कि लोगों के जीवन पर सीधा अन्याय है।

रोज़गार की तस्वीर भी निराशाजनक है। खेती लगातार बर्बाद हो रही है, कभी जंगली जानवरों से, कभी बाज़ार की बेरुखी से। जिन खेतों में कभी अनाज लहराता था, वहाँ अब झाड़ियाँ हैं। जो खेती बची है, वह अब घाटे का सौदा बन गई है। यह केवल कृषि का पतन नहीं, बल्कि उस आत्मसम्मान का भी क्षरण है जो कभी पहाड़ की पहचान था।

फिर भी, उम्मीद खत्म नहीं हुई है। पहाड़ की हर घाटी अपनी विशिष्ट पहचान रखती है, कहीं औषधीय पौधे हैं, कहीं फल–फूल, कहीं हस्तशिल्प की परंपरा। जरूरत है इन विशेषताओं को रोज़गार से जोड़ने की। यदि सरकारें स्थानीय उत्पादों को ब्रांड बनाकर प्रोसेसिंग, विपणन और परिवहन की श्रृंखला तैयार करें, तो पलायन रुक सकता है। बागेश्वर में शहद, धारचूला में ऊनी उत्पाद, रामगढ़–मुक्तेश्वर में इको-टूरिज्म जैसे मॉडल आत्मनिर्भर पहाड़ की राह दिखा सकते हैं।

लेकिन बदलाव केवल योजनाओं से नहीं आएगा। जनता को अपनी भूमिका समझनी होगी। हमें नेताओं से सुविधा नहीं, दृष्टि माँगनी होगी। हमें योग्य प्रत्याशियों को आगे लाना होगा क्योंकि लोकतंत्र का सबसे गहरा सुधार केवल जनता के विवेक से आता है।

पहाड़ का मौन अब सिर्फ़ भौगोलिक नहीं रहा, यह हमारी सामूहिक चुप्पी का प्रतीक है। अगर हम अब भी नहीं बोले, तो आने वाली पीढ़ियाँ केवल इन वीरान घरों, सूने आँगनों और बंद स्कूलों की कहानियाँ पढ़ेंगी। देवभूमि की यह पुकार हम सब से जवाब माँग रही है और समय आ गया है कि हम इस मौन को तोड़ें, इससे पहले कि यह मौन स्थायी शोकगीत बन जाए

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