जस्टिस यशवंत वर्मा पर महाभियोग की तैयारी तेज, 200 से अधिक सांसदों ने किया नोटिस दायर

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नई दिल्ली — दिल्ली हाई कोर्ट से इलाहाबाद हाई कोर्ट ट्रांसफर किए गए जस्टिस यशवंत वर्मा के खिलाफ महाभियोग की प्रक्रिया तेज़ हो गई है। संसद के मानसून सत्र के पहले ही दिन, 21 जुलाई को लोकसभा और राज्यसभा के पीठासीन अधिकारियों को उनके खिलाफ महाभियोग का नोटिस सौंपा गया। इस नोटिस पर 200 से ज्यादा सांसदों के हस्ताक्षर हैं, जिसमें विभिन्न दलों के प्रतिनिधि शामिल हैं।

कमेटी करेगी जांच
सूत्रों के मुताबिक, लोकसभा अध्यक्ष जल्द ही एक तीन सदस्यीय जांच कमेटी गठित कर सकते हैं, जो जस्टिस वर्मा के खिलाफ लगे आरोपों की जांच करेगी। इस कमेटी में सुप्रीम कोर्ट के एक जज, किसी हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश और एक प्रतिष्ठित न्यायविद को शामिल किया जाएगा।

क्या है पूरा मामला?
जस्टिस वर्मा उस वक्त विवादों में आए जब 14 मार्च 2025 को उनके दिल्ली स्थित सरकारी आवास पर आग लग गई थी। आग बुझाने पहुंचे अग्निशमन विभाग को घर में बड़ी मात्रा में नकदी मिली। आग में कुछ नोट जल भी गए थे, लेकिन घटनास्थल से सामने आए वीडियो में 500 रुपये के जले हुए नोटों के बंडल स्पष्ट रूप से देखे गए। घटना के बाद उन्हें दिल्ली हाई कोर्ट से इलाहाबाद हाई कोर्ट ट्रांसफर कर दिया गया था।

पहले भी लाए जा चुके हैं महाभियोग प्रस्ताव, लेकिन कोई नहीं हुआ बर्खास्त
भारत के न्यायिक इतिहास में इससे पहले भी कई जजों के खिलाफ महाभियोग प्रस्ताव लाए जा चुके हैं, लेकिन आज तक किसी भी जज को संसद के जरिए पद से नहीं हटाया गया है।

महाभियोग के चर्चित मामले:

  • जस्टिस वी. रामास्वामी (1993): सुप्रीम कोर्ट के जज पर वित्तीय अनियमितताओं का आरोप लगा। राज्यसभा में प्रस्ताव पारित हुआ लेकिन लोकसभा में गिर गया।

  • जस्टिस सौमित्र सेन (2011): कलकत्ता हाई कोर्ट के जज ने लोकसभा में चर्चा से पहले ही इस्तीफा दे दिया।

  • जस्टिस एस.के. गंगेले (2015): यौन उत्पीड़न के आरोप लगे, लेकिन जांच में दोषमुक्त पाए गए।

  • जस्टिस जे.बी. पारदीवाला (2015): आरक्षण पर विवादित टिप्पणी के कारण नोटिस मिला, टिप्पणी हटाने के बाद मामला समाप्त।

  • जस्टिस सी.वी. नागार्जुन रेड्डी (2017): कुछ सांसदों ने हस्ताक्षर वापस ले लिए, प्रस्ताव आगे नहीं बढ़ पाया।

  • जस्टिस दीपक मिश्रा (2018): तत्कालीन CJI के खिलाफ लाया गया प्रस्ताव राज्यसभा के सभापति द्वारा खारिज कर दिया गया।

अब देखना यह होगा कि जस्टिस वर्मा के मामले में जांच कमेटी की रिपोर्ट और संसद की कार्रवाई क्या दिशा लेती है। यह केस भारतीय न्यायपालिका में महाभियोग की प्रक्रिया को लेकर एक महत्वपूर्ण उदाहरण बन सकता है।

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